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कुम्भ स्नान का वैज्ञानिक स्वास्थ्यकर- भैषज प्रभाव व महत्व

कुम्भ स्नान का वैज्ञानिक स्वास्थ्यकर- भैषज प्रभाव व महत्व

द्वारा - डॉ० वाचस्पति त्रिपाठी
भैषज वैज्ञानिक व हर्बल इण्डस्ट्री विशेषज्ञ


कुम्भ स्नान के पाँचों स्नान (कल्पवास) के दौरान सूक्ष्म जीवाणुओं का शरीर में बिजारोपण (Inoculation) ही अमृत वर्षापान है जिससे प्राप्त रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) अनेक फैलने वाली व्याधियों जैसे टी.बी., डेंगू, चिकनगुनिया, सर्दी-जुकाम, एड्स व अन्य भयावह व्याधियों आदि से मनुष्य कदापि प्रभावित नहीं होता और स्वस्थ्य दीर्घायु जीवन को प्राप्त करता है।

आधुनिक चिकित्सा में विभिन्न बिमारियों हेतु विभिन्न ''टिकाओ''(Vaccines) का प्रचलन है जैसे- हिपैटाइटिस, पोलियो, मिसेल्स, बी.सी.जी. इत्यादि। अनेकों बिमारियों हेतु वैज्ञानिक नए-नए टिकाओं का आविष्कार करने में लगे हैं। एड्स व टी.बी. से मिलते-जुलते डेगू, चिकनगुनिया आदि नई-नई बिमारियाँ पैदा हो रही हैं, और वैज्ञानिक इनके अमृत रूपी ''टीका'' का खोज़ करने में लगा है।

आधुनिक विज्ञान भी ठण्ड को ''हेल्दी-सीज़न'' (स्वास्थ्यकर मौसम) मानता है अर्थात् मनुष्य खाए, खूब शरीर को लगे और बिमारियाँ कम से कम हों। फैलने वाली बिमारियाँ ठण्ड में कम फैलती हैं। इन्हीं कारणों से शल्य-चिकित्सक आपरेशन करने की सलाह भी ठण्ड में देते हैं अर्थात् ठण्ड को उपयुक्त मानते हैं।

प्रयाग के अर्धकुम्भ स्नान में लाखों-करोड़ों की संख्या में जनसमुदाय ने सभी स्नानों में भाग लिया। संगम-प्रयाग का जल वही पावन-पवित्रता लिए हुए था, कुछ अपवादों को छोड़। साधु-सन्त, भक्त, नर-नारी जनता कड़ाके की ठण्ड में भी चादर पर सोए और संगम-प्रयाग में डुबकी लगाई,ज्यादातर लोग स्वस्थ्य रहे, कुछ लोग बिमार भी हुए, कुछ गम्भीर बिमार हुए। इसी धर्म पर अटूट विश्वास को धर्मान्धता का भी नाम कुछ लोग देते हैं।

परन्तु अगर उपरोक्त वैज्ञानिक तथ्यों को हम ''कुम्भ स्नान'' मेले से तुलना करें तो हमे ''कुम्भ स्नान मेले'' जैसी धार्मिक रीति-रिवाजों का वैज्ञानिक स्वास्थ्यकर भैषज गुण समझ में सहजता व सरलता से आ जाएगा।

कुम्भ व अर्धकुम्भ प्रत्येक बारह वर्षो व छ: वर्षो में क्रमशः - मकर राशि के सूर्य में लगता है, जब सूर्य देवपथ, देवमार्ग-गामी, उत्तरायण होने लगता है। कुम्भ अर्धकुम्भ में पाँच प्रमुख स्नान लगभग एक माह के अन्तराल में स्थान बदल-बदल के प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक में विशाल नदी संगम, गंगा, छिप्रा व गोदावरी के विशाल तट क्षेत्र में, शीतकाल में लगभग जनवरी माह में हमेसा अनिवार्यत: लगता है। जहाँ विश्वभर से भारी संख्या में सनातनी आचार विचार में विश्वास रखने वाले नर-नारी आते हैं और पावन नदियों में डुबकी लगाकर अमृत वर्षा का पान करते हुए सदैव सुख व शान्ति की कामना करते हैं।

कुम्भ स्नान का एक माह का समय, विशाल क्षेत्रफल पर, विशाल नदियों पर होना, भारी जनता को एक साथ स्नान करने को प्रेरित करता है। स्थान परिवर्तन भारत के भौगोलिक दूरी के कारणों से प्रभावित अथवा वंचित होने वाले नर-नारी को भी कुम्भ स्नान के सुलभता हेतु प्रेरित करता है। ऐसा भी देखा गया है कि जो जनता कुम्भ स्नान नहीं कर पाते वह किसी पवित्र नदी पर कुम्भ-काल में स्नान करते ही हैं।

जैसे कि वैक्सीन अथवा टिका की छोटी मात्रा के बिजारोपण (Inoculation) से मनुष्य किसी व्याधि के प्रति रोग-प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) विकसित करता है वैसे ही कुम्भ स्नान के समय मनुष्य, जल-मनुष्य प्रकृति अन्तर्गत नए व पुराने सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा बिजारोपित होता है। और मनुष्य उन तमाम अनजान सूक्ष्मजीवाणुओं के प्रति रोग-प्रतिरोधक क्षमता को अपने शरीर में विकसित करता है जो एक स्वत: शारीरिक जैविक प्रणाली है।

शीतकाल अनेक फैलने वाले रोगों को मनुष्यों में फैलने से वन्चित करता है और ''हेल्दी सीजन'' शरीर अन्तर्गत रोग प्रतिरोधक क्षमा को तेजी से विकसित करता है।

कल्पवास शीतकाल में होता है और पौष्टिक प्रसाद व आहार सेवन से कल्पवासी अच्छा आहार ग्रहण करते हैं जो शरीर में जैविक क्रियाओं को स्वस्थ्य एवं तीव्र करते हैं।

आधुनिक विज्ञान तमाम नए सूक्ष्मजीवाणु (with new DNA - RNA strains) के पैदा होने को मानता है। एड्स और टी.बी. से मिलती-जुलती नई बिमारियाँ, चिकनगुनिया, सर्दीजुकाम की नई बिमारियाँ, बर्डफ्लू, डेंगू आदि इन्हीं नए अनजान सूक्ष्म जीवाणुओं की ही देन है। कुम्भ स्नान में भी ऐसे ही नए अनजान अनेकों सूक्ष्मजीवाणुओं द्वारा मनुष्य बिजारोपित होता है और स्वत: उनरोगों हेतु रोग प्रतिरोधक क्षमता एक साथ विकसित कर लेता है। और आने वाले अनेकों कुम्भ स्नान से, आने वाले अनेकों व्याधियों हेतु सनातनी आचार-विचार धर्म के पालन से मनुष्य रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करता रहता है और स्वस्थ, सुखी व शान्ति दीर्घायु जीवन को पाता है।

जैविक क्रियाओं की स्वास्थ्य व तीव्रता एवं सूक्ष्म जीवाणुओं का शरीर में बिजारोपण शरीर के रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते है जिसे रक्त अन्तर्गत इमिनोग्लोब्लिन (Ig.) के परीक्षण से जाना जा सकता है।

कुम्भ स्नान के अनेकों फल लाभ के अलावा शायद अनजान (unknown) सूक्ष्म जीवाणुओं का मनुष्यों में बिजारोपण (Inoculation) ही अमृत वर्षा है जिसके द्वारा भविष्य में अनेकों रोगों हेतु हम रोग-प्रतिरोधक (Immunity) क्षमता को प्राप्त करते हैं। अतिशयोक्ति नहीं होगा कहना कि सनातनी आचार-विचार, आहार-विहार, धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन से अनेक भयावह नए-पुराने बिमारियों के प्रति मनुष्य स्वस्थ्य रह सकता है और सुख-शान्ति से जीवन निर्वाह कर सकता है।

Vachaspati Tripathi


Member-National Panel of Expert on Ministry of Sci. & Tec. National Committee on Drug & Pharmaceuticals Research from Natural Products Planning Commission, Government of India
Expert member on Heavy metal for Natural Products, National Committee constituted under DST, GOI.
General Secretary Prof. S.N. Tripathi, Memorial foundation
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