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देशद्रोह भ्रष्टाचार-विकासशील राष्ट्र और बौद्धिक सम्पन्नता

देशद्रोह भ्रष्टाचार-विकासशील राष्ट्र और बौद्धिक सम्पन्नता

डॉ० वाचस्पति त्रिपाठी

विकासशील राष्ट्र में बौद्धिक विकास भी विकासशील होता है।
बौद्धिक विकास व सम्पन्नता ही राष्ट्रीय चेतना का विकास करती है।
राष्ट्रीय चेतना ही राष्ट्रीयता को जन्म देती है।
राष्ट्रीयता ही किसी देश के नागरिक को राष्ट्रहित व राष्ट्रप्रेम को जागृत व प्रथम वरीयता देती है।
राष्ट्रहित और राष्ट्रप्रेम ही राष्ट्र के नियम व धर्मो का मनुष्य से कर्तव्यबोध व पालन कराती है ।

हमारे विकासशील देश भारत मे नागरिकों के आर्थिक स्थिति में बहुत ही असमानताएं हैं, जहाँ गरीब आत्महत्या कर रहा तो अमीर विश्व की विलासिता का भोग करता है। देश की आज की स्थिति गरीबी व अमीरों के बीच की खाई को और बढ़ा रही है।

राष्ट्र के नियम व धर्म से जनित कर्तव्यबोध ही राष्ट्र शत्रुता, भ्रष्टाचार, पाप, अनैतिक कर्मों व देश-द्रोह को समाप्त करती है और उच्च चरित्र को स्थापित करती है।

कभी हमारा भारत राष्ट्र विश्व में सर्वोच्च बौद्धिक सम्पन्नता रखता था। अत:-
''बसुधैवकुटुम्बकम्''
''सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामय:''
के सूत्र को मानता था।

परन्तु राम और रावण व कौरव और पाण्डवों के दर्शन वाले राष्ट्र भारत में विषमता बढ़ती गयी व धीरे-धीरे जैन व बुद्धकाल में मतान्तर-विषयान्तरों ने जन्म लेना शुरू किया। लोभ, चाटुकारिता, कूटनीतियों ने सर उठाना शुरू किया और सुल्तानों के आक्रमण व शासन तदुपरान्त अंग्रेजों के शासनकाल में, हमारे विश्व सर्वोच्च बौद्धिक सम्पन्नता वाले राष्ट्र के नागरिकों के राष्ट्रीय चेतना पर, धूल जमना शुरू हो गया परिणामस्वरूप, कटुता, शत्रुता, भ्रष्टाचार, राष्ट्रद्रोह, चाटुकारिता जन्म लेता गया।

स्वंत्रता मिलने में भी राष्ट्र को सैकड़ों वर्ष लग गए। हमारे राष्ट्र के नागरिकों को महात्मा गाँधी बापू ने स्वतंत्रता का धर्म बोध, राष्ट्रबोध कराया, सफलता मिला, पर तब भी देश के बॅटवारे व स्थिति ने कत्लेआम-शत्रुता, वैमनस्य व असन्तोष को जन्म दे दिया।

भारतीय नागरिकों में कटुता, शत्रुता, चाटुकारिता, कत्लेआम, वैमनस्य, असन्तोष, भ्रष्टाचार व देशद्रोह ने जन्म लिया और विश्व सर्वोच्च बौद्धिक सम्पन्न राष्ट्र भारत के नागरिकों में राष्ट्रीय चेतना में गिरावट आने लगी। राष्ट्रीयता में कमी, राष्ट्रहित-राष्ट्रप्रेम में कमी होने लगी जिससे अधिसंख्य नागरिक राष्ट्र नियम व धर्मों से विमुख होने लगे। राष्ट्र के नियम व धर्मों के प्रति कर्तव्य बोध से परायणता और स्वार्थ सर उठाने लगी।

अनेको मार्गों से आरोपित पश्चिम सभ्यता ने भी कुप्रभाव छोड़ा और स्वार्थ को नया नाम ''प्रोफेस्नलिज़्म'' दे दिया। जहाँ रिश्तों के बीच सम्बन्ध भावनाओं की मर्यादा शून्य करीब होती है।

कर्मो को समझना पड़ेगा, हर कर्म में स्वार्थ छिपा होता है परन्तु कर्मों में परोपकार, वात्सल्य, राष्ट्रहित, समाजहित भी होता है। सिर्फ स्वहित ही तो कर्म नहीं है।

कर्तव्य बोध से परायणता ही भ्रष्टाचार, देशद्रोह, अनैतिक कर्मो को स्थापित करने लगती है। राष्ट्रीय बौद्धिक सम्पन्नता ही, भ्रष्टाचार-मुक्त, देशद्रोह मुक्त विकसित राष्ट्र को जन्म देता है।


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